सोमवार, 12 मार्च 2012

स्वामी विवेकानन्द और कार्ल मार्क्स



स्वामी विवेकानन्द और कार्ल मार्क्स

दो व्यक्तित्व-दो विचार

एक विश्वव्यापी,

दूसरा कालबाह्य

स्वामी विवेकानन्द तथा कार्ल मार्क्स 19वीं शताब्दी के दो महान परिवर्तनकारी व्यक्तित्व थे। जहां कार्ल मार्क्स (1818-1883) ने पाश्चात्य जगत में भौतिकवाद को एक नवीन दिशा दी वहीं स्वामी विवेकानंद (1863-1902) ने भारतीय दर्शन व अध्यात्मिकता के संदेश से विश्व को झकझोर दिया।

पारिवारिक परिवेश में समानता

दोनों के प्रारम्भिक जीवन में कुछ साम्य दृष्टिगोचर होता है। दोनों 19वीं शताब्दी में जन्मे थे। दोनों के पिता जाने-माने कानूनविद् थे। दोनों के पिताओं ने उन्हें अपने-अपनेे ढंग से जीवन दृष्टि दी। दोनों गहन अध्ययनशील थे तथा इतिहास व दर्शन में गहरी रुचि रखते थे। दोनों ने गरीबी का प्रत्यक्ष अनुभव किया तथा जीवन में उससे जूझे थे। मार्क्स ने पहले 17 वर्ष रोमन लोगों द्वारा निर्मित त्रियेर नगर में बिताए, जहां ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के साथ वहां की मलिन बस्तियों को देखा था। वहीं स्वामी विवेकानन्द ने 1890-1893 तक परिव्राजक के रूप में भारत में सर्वत्र घूमकर भारत की गरीबी के दर्शन किए तथा उसकी अनुभूति की थी।
मार्क्स के पिता समृद्धशाली, ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीने के आदी तथा प्रभावशाली वकील थे। लौकिक प्रतिष्ठा तथा व्यवसाय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यहूदी धर्म को छोड़कर ईसाइयत को अपनाया था। उन्होंने कार्ल मार्क्स को एक सफल वकील बनाने तथा भौतिक समृद्धि की ओर आकृष्ट करने का प्रयत्न किया। मार्क्स ने क्रमश: बोन, बर्लिन व जेना विश्वविद्यालयों में पढ़कर दर्शन शास्त्र में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे शिक्षक बनना चाहते थे पर बने एक पत्रकार तथा लेखक। एक जर्मन अतिवादी उद्योगपति के पुत्र फ्रेडरिक एंजिल (1820-1895) से 1844 में उनकी भेंट उनके जीवन को मोड़ देने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उसने मार्क्स की धन तथा विचारों से सहायता की। मार्क्स उसे 'वास्तविक विश्वकोष' मानते थे। बाद में दोनों ने मिलकर नए वैचारिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।
स्वामी विवेकानन्द एक समृद्धशाली वकील विश्वनाथ दत्त के पुत्र थे जिन्होंने अपने पुत्र नरेन या नरेन्द्र को तर्क तथा बुद्धि से विकसित किया तथा मां भुवनेश्वरी देवी ने इतिहास और पौराणिक प्रसंगों को सुनाकर भावुक बनाया था। उन्होंने पाश्चात्य तथा भारतीय दर्शन तथा इतिहास का गंभीर अध्ययन किया था तथा उनकी रुचि दर्शन में थी। रोमा रोलां के शब्दों में, 'विवेकानन्द कभी भी द्वितीय नहीं बल्कि सर्वदा अद्वितीय थे।' उनके कालेज के प्राचार्य हेस्टी के मत में, 'जर्मनी व इग्लैण्ड के विश्वविद्यालयों में उन जैसा कोई प्रतिभाशाली विद्यार्थी न था।' नवम्बर, 1881 में उनकी स्वामी रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट एक आश्चर्यजनक प्रसंग था जिसने दुनिया के एक बड़े नास्तिक को विश्व का सबसे बड़ा आस्तिक बना दिया। सितम्बर, 1893 के शिकागो विश्व सम्मेलन में वे विश्व के महानतम पुरुष बन गए।

विचारों में मौलिक अन्तर

जहां कार्ल मार्क्स ने इंग्लैण्ड आदि देशों की औद्योगिक क्रांति तथा फ्रांस की विभिन्न क्रांतियों तथा पाश्चात्य दार्शनिकों का गंभीर अध्ययन किया था, वहीं स्वामी विवेकानन्द ने पाश्चात्य दर्शन के साथ वेदों से लेकर वर्तमान तक के सभी भारतीय दर्शन ग्रंथों तथा शास्त्रों का विस्तृत अध्ययन, चिंतन, मनन किया था। दोनों ने जर्मन के विख्यात दार्शनिक हीगेल को भी पढ़ा था परन्तु दोनों के निष्कर्ष एक-दूसरे से भिन्न ही नहीं बल्कि विपरीत थे। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक हीगेल, जो भारतीय जीवन दर्शन से अत्यंत प्रभावित थे तथा जिन्होंने भारत को 'मनोकामना पूर्ण करने की भूमि' कहा था, ने द्वन्द्वात्मक सिद्धांत का विवेचन किया तथा इसे सोचने की प्रक्रिया बताया। निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए उन्होंने सततवाद, प्रतिवाद तथा संवाद का सहारा लिया।
कार्ल मार्क्स ने हीगेल को कल्पनावादी कहा और आर्थिक तत्व को ही निर्णय का मापदण्ड माना। मार्क्स ने विश्व में परिवर्तन का रहस्य उत्पादन के साधनों में ढूंढा तथा इसी आधार पर विश्व के इतिहास की मनमाने ढंग से भौतिकवादी व्याख्या की। इसी आधार पर मार्क्स ने तत्कालीन पूंजीवाद का विनाश तथा सर्वहारा के अधिनायकवाद की वकालत की। स्वामी विवेकानन्द ने वेदों, उपनिषदों आदि के गहन अध्ययन के आधार पर हीगेल के चिन्तन को सत्य के निकट पाया तथा विचारों की महत्ता को स्वीकार किया। उन्होंने जीवन में आध्यात्मिकता को सर्वोच्च स्थान दिया। आध्यात्मिकता को 'राष्ट्र का मेरुदण्ड' तथा 'मानवता की माता' कहा। भारतीय दर्शन के अनुकूल आर्थिक तत्व को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का केवल एक भाग ही माना।

वर्ग संघर्ष या एकत्व

कार्ल मार्क्स ने जीवन में भौतिक पक्ष को सर्वोच्चता दी जबकि स्वामी विवेकानन्द ने 'आत्म ज्ञान' को जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि बताया। स्वाभाविक रूप से कार्ल मार्क्स ने अतीत तथा वर्तमान में चहुंओर आर्थिक संघर्ष पाया। उन्होंने समाज को दो भागों में बांटा, एक- जिनके पास सम्पत्ति है तथा दूसरा-जो धनहीन है। इन दोनों में मार्क्स को सतत् वर्ग संघर्ष दिखा है। मार्क्स ने विश्व के समस्त समाजों के इतिहास को वर्ग संघर्ष का इतिहास कहा। वस्तुत: मार्क्स का यह विश्लेषण भ्रामक, तथ्यहीन, अव्यावहारिक तथा दोषपूर्ण था।
स्वामी विवेकानंद ने वर्ग भेद को पूर्णत: अस्वीकार किया। उन्होंने न केवल मानव के अस्तित्व में एकता के दर्शन किए बल्कि पशु-पक्षी, पेड़- पौधों, यहां तक कि चर-अचर, सभी में एकत्व की बात कही। उन्होंने एकत्व उच्चतम देवताओं से लेकर निम्नतम व्यक्तियों में देखा। इसलिए उन्होंने अपने भाषणों में वीरता तथा साहस का भाव जगाते हुए भारतीयता तथा उसमें एकत्व के भाव को जगाते हुए कहा, 'गर्व से बोलो मैं भारतवासी, प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। तुम चिल्लाकर कहो, अज्ञानी भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, दरिद्र भारतवासी मेरा भाई है।' उन्होंने किसी भी भेद को स्वीकार नहीं किया बल्कि व्यक्ति की सेवा को ईश्वर की पूजा कहा। उल्लेखनीय है कि जिन-जिन देशों में मार्क्सवाद का प्रयोग हुआ, वहां वर्ग संघर्ष तो समाप्त नहीं हुआ बल्कि एक नया वर्ग 'कम्युनिस्ट राजनीतिक नौकरशाह' खड़ा हो गया।

 धर्म का स्वरूप

कार्ल मार्क्स ने तत्कालीन जर्मन विद्वान फ्यूरबैच (1804-1872) की भांति माना कि परमात्मा मनुष्य को नहीं बनाता बल्कि मनुष्य ने परमात्मा को बनाया। इसी आधार पर वे धर्म को 'अफीम की पुड़िया' 'भावहीन विचार' आदि कहते थे। इसके विपरीत स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को 'राष्ट्रीय आत्मा' कहा है। धर्म को 'राष्ट्र का प्राण' भी कहा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत में प्रत्येक वस्तु धर्म के माध्यम से जानी जाती है। धर्म भारत के राष्ट्रीय दर्शन का स्थायी स्वर है। शिकागो में उन्होंने हिन्दू धर्म को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया। धर्म तथा ज्ञान को एक-दूसरे का पूरक बतलाते हुए इसे 'चेतना का विज्ञान' कहा। उन्होंने बतलाया कि हिन्दू को राजनीति भी धर्म की भाषा में समझायी जा सकती है। पर साथ ही कट्टरपंथी न बन, उसे तर्क तथा अनुभव के आधार पर आंकने को कहा। उन्होंने सही अर्थों में हिन्दुत्व को मानव धर्म बतलाया।

राष्ट्रवाद का प्रश्न

मार्क्स के चिन्तन में ऐसे वर्गहीन, राज्यविहीन, धर्मविहीन समाज की कल्पना है जिसमें न कोई राज्य है, न सरकार, न प्रजातंत्र, न कोई संसदीय व्यवस्था और न ही कोई राष्ट्र का विचार। यदि कोई विचार है भी, तो वह नकारात्मक तथा ध्वंसात्मक है। वस्तुत: यही नकारात्मक चिन्तन विभिन्न देशों में राष्ट्रवादी शक्तियों द्वारा मार्क्सवाद के पतन का कारण बना। स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीयता के पोषक ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने विश्व के राष्ट्रों का उत्थान और पतन का विश्लेषण करते हुए प्रश्न किया कि यूनान, रोम, स्पेन, मंगोल आदि आक्रमणकारी राष्ट्र अब कहां है? उन्होंने भारत को विश्व का प्राचीनतम राष्ट्र तथा अमरीका को 'बच्चा राष्ट्र' कहा। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ वर्तमान राष्ट्रों के बारे में सिंह गर्जना करते हुए कहा, 'इन मुट्ठी भर राष्ट्रों में से एक भी तो दो शताब्दियों तक जीवित नहीं रह सकता। किन्तु हमारी जाति की संस्थाएं युगों-युगों की कसौटी पर खरी उतरी हैं।' उन्होंने भारत को विश्व का सर्वाधिक नैतिक परायण राष्ट्र माना है, क्योंकि यह आध्यात्मिकता पर टिका है। उन्होंने पुन: कहा 'मेरा विश्वास है कि भारतीय राष्ट्र समस्त राष्ट्रों में अत्यधिक सदाचारी और धार्मिक राष्ट्र है। किसी दूसरे राष्ट्र की तुलना हिन्दुओं के राष्ट्र से करना निंदा के समान पातक होगा।'

परिवार की संरचना

कार्ल मार्क्स तथा उसके मित्र फ्रेडरिक एंजिल ने परिवार के सम्बंध में अपनी पहली सम्मिलित पुस्तक 'होली फैमिली' (1844) लिखी। वस्तुत: पुस्तक में शीर्षक के विपरीत परिवार व्यवस्था की अपवित्रता का ही वर्णन किया गया है। परिवार का चित्रण भौतिकतावादी दृष्टिकोण से किया गया है। परिवार में किसी के किसी से भी यौन सम्बंध को स्वाभाविक बताया गया है। उनके अनुसार, 'आधुनिक एकनिष्ठ विवाह व परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है.... परिवार में पति पूंजीपति होता है, पत्नी सर्वहारा की स्थिति में होती है।' उनका विचार है कि सामाजिक क्रांति से वर्तमान दौर में व्यक्तिगत परिवार निश्चित रूप से लुप्त हो जाएगा और बच्चे (वैध हों या अवैध) राज्य की देख-रेख में रहेंगे। इसके विपरीत स्वामी विवेकानन्द भारतीय समाज का आधार नारी की प्रतिष्ठा तथा परिवार को सर्वोच्च संस्कार-स्थली मानते थे। उन्होंने अपने अनेक भाषणों में भारत में स्त्री जीवन का आरम्भ और अंत मातृत्व में बतलाया। उन्होंने महिला की अवस्था को राष्ट्र की प्रगति का थर्मामीटर, संस्कृति का संरक्षक तथा सांस्कृतिक उन्नति व आध्यात्मिकता का एक सच्चा पैमाना बतलाया।

सफलता का मार्ग

कार्ल मार्क्स ने उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिंसा, क्रांति या जैसे भी सम्भव हो, प्राप्त करना बतलाया। इसमें नैतिकता, स्वतंत्रता तथा वैधता का कोई स्थान नहीं है। उद्देश्य की पूर्ति के जबरदस्ती एकत्रीकरण, विलीनीकरण अपने सोवियत संघ तथा चीन के प्रसंग में सोवियतीकरण या चीनीकरण में वे जरा भी नहीं हिचके। स्वामी विवेकानन्द ने उपरोक्त मार्ग को सर्वथा अस्वीकार्य बताया है। व्यावहारिक रूप से मार्क्स की सभी भविष्यवाणियां भी गलत साबित हुईं। आखिर में प्रश्न है कि कार्ल मार्क्स तथा स्वामी विवेकानन्द ने अपने देश तथा विश्व को क्या दिया? मार्क्स के निधन को लगभग 130 वर्ष हो गए परन्तु भयंकर हिंसा, नरसंहार, 10 करोड़ व्यक्तियों की हत्या, अमानुषिक यातनाओं के पश्चात विश्व के किसी भी देश में वर्गहीन, राज्यविहीन, धर्मविहीन समाज की रचना न हुई। मार्क्सवाद ने ही दिया रूस में क्रूर तथा अत्याचारी अधिनायकवादी लेनिन, स्टालिन, ब्रेझनेव, चीन में हत्यारे माओत्से तुंग व देंग, पोलैंड में जार, चेकोस्लोवाकिया में गुस्तावो हुसाक, हंगरी में जनोस कादर, रोमानिया में पेटरू ग्रोत्र, निकोलई चेसस्क्यू, पूर्व जर्मनी के एरिच हेनोकेर, उत्तरी कोरिया में किम इल सुंग तथा कम्यूचिया में पोल पोट आदि। इन सब देशों के इतिहास विश्व की डरावनी स्मृतियों का भाग बन गए हैं।
इसके विपरीत स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवन के कुल 39 वर्षों में विश्व को मानव सेवा, विश्व बंधुत्व तथा शांति, स्वतंत्र चिन्तन का दिव्य संदेश दिया। उन्होंने भारत में धर्म तथा आध्यात्मिकता के आधार पर देश में धार्मिक तथा सामाजिक पुनर्जागरण किया। उन्होंने देश की भावी पीढ़ी में  देशभक्ति, स्वाभिमान, आत्मविश्वास तथा आत्म गौरव जगाया। उनसे प्रेरणा लेकर महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, रवीन्द्रनाथ टैगोर, श्री गुरूजी ने राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त किया। आज भी रामकृष्ण मिशन, अद्वैत आश्रम तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके संदेश के अनुसार राष्ट्र में देशभक्ति तथा इसे सुदृढ़ करने में लगे हैं। समय की मांग है कि स्वामी विवेकानन्द की 150वीं वर्षगांठ पर राष्ट्र जागरण तथा राष्ट्र के पुनर्निर्माण में देश की युवा पीढ़ी भारतीय समाज की समस्त समस्याओं के निदान के लिए स्वामी विवेकानन्द की भावना में 'रोल मॉडल' तथा 'लाइट हाउस' बने।

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