मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

केसरिया का बौध स्‍तूप

    


3  फरवरी को मुजफफरपुर के साहेबगंज प्रखण्‍ड में परियोजना के कार्य हेतु गया कार्य था स्‍वर्ण जयन्‍ती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत बने भवनो को पहचान करने एवं साहेबगंज प्रखण्ड के प्रखण्‍ड विकास पदाधिकारी एवं जीविका परियोजना के प्रखण्‍ड परियोजना प्रबंधक से मिल कर भवनो के स्थिति से अवगत कराने के लिए  इस क्रम में भवन की स्थिति देखने के लिए बैधनाथपुर ग्राम में बने भवन का निरीक्षण करने के लिए गया भवन की स्‍थिति  तो अच्‍छी   थी परन्तु फर्श टुटा हुआ था गांव वाले के द्वारा पता चला की इस भवन का उपयोग गांव वाले किसी कार्यक्रम में करते है इस कारण इसकी स्थिति अच्छी  नही है तब ही पता चला की यहा से केसरिया मात्र 6 कि मी की दुरी पर है तो सोचा क्‍यो ना जा कर धुम आउ तो चल दिया केसरीया धुमने के लिए। 
तो आइए जानते है केसरिया स्तुप के बारे में  केसरिया चंपारण से ३५ किलोमीटर दूर दक्षिण साहेबगंज-चकिया मार्ग पर लाल छपरा चौक के पास अवस्थित है। 


यह पुरातात्विक महत्व का प्राचीन ऐतिहासिक स्थल हैयहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है। केसरिया एक महत्‍वपूर्ण बौद्ध स्‍थल हैयह चंपारण में स्थित एक छोटा सा शहर है जो गंडक नदी के किनारे बसा हुआ हैइसका इतिहास काफी पुराना व समृद्ध हैबौद्ध तीर्थस्‍थलों में इसका महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 

बुद्ध ने वैशाली से कुशीनगर जाते हुए एक रात केसरिया में बिताई थी तथा लिच्‍छवियों को अपना भिक्षा-पात्र प्रदान किया था।कहा जाता है कि जब भगवान बुद्ध यहां से जाने लगे तो लिच्‍छवियों ने उन्‍हें रोकने का काफी प्रयास किया लेकिन जब लिच्‍छवि नहीं माने तो भगवान बुद्ध ने उन्‍हें रोकने के लिए नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्‍पन्‍न की इसके पश्‍चात् ही भगवान बुद्ध यहां से जा पाने में सफल हो सके थे ।सम्राट अशोक ने यहां एक स्‍तूप का निर्माण करवाया था। इसे विश्‍व का सबसे बड़ा स्‍तूप माना जाता है भगवान बुद्ध जब महापरिनिर्वाण ग्रहण करने कुशीनगर जा रहे थे तो वह एक दिन के लिए केसरिया में ठहरें थे। जिस स्‍थान पर पर वह ठहरें थे उसी जगह पर कुछ समय बाद सम्राट अशोक ने स्‍मरण के रुप में स्‍तूप का निर्माण करवाया था। इसे विश्‍व का सबसे बड़ा स्‍तूप माना जाता है।वर्तमान में यह स्‍तूप 1400 फीट के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 51 फीट हैअलेक्‍जेंडर कनिंघम के अनुसार मूल स्‍तूप 70 फीट ऊंचा था। केसरिया जाने के लिए मोतिहारी नजदीकी रेलवे स्टेशन है एवं यहां पर सडक मार्ग से भी आया जा सकता है। रहने ठहरने का व्‍यवस्‍था  मोतीहारी में हो सकता है । 


केसरिया का बोध स्‍तूप विश्‍व का सबसे बडा स्‍तूप 


स्‍तूप को साफ सफाई का काम चल रहा है 1993 से यहां पर खुदाई चल रही हे 

स्‍तूप का कुछ हिस्‍सा साफ हो चुका है आधा हिस्‍सा बाकी है 

स्‍तूप के नजदीक एक रोचक वूक्ष 

सफाई करते कर्मी 





इसी भवन को देखने के लिए गया था जिसमें ग्राम संगठन संगठन की कार्यालय खोने को प्रस्‍ताव है 







मंगलवार, 20 जनवरी 2015

यात्रा वैशाली एवं कोल्‍हूआ का

 वर्ष 2014 में किसी भी नये जगह की यात्रा नही किया था जिस कारण मन में काफी विचार आ रहा था की मै क्‍या कर रहा हूू कोइ्र भी नयी जगह का भ्रमण नही कर पा रहा हू कार्य की व्‍यस्‍तता के कारण नये जगह का भ्रमण नही हो पा रहा था तथा कुछ आर्थिक समस्‍या भी आ रही थी क्‍योकि मै अपना धर बनाने में पैसा का उपयोग कर रहा था  तो सोचा क्‍यो न कोई यात्रा किया जाए नए साल में तो राजस्‍थान आजीविका विकास परिषद से दिनांक 10 जनवरी को 47 एकिटव वूमन समूह क्‍यों पर प्रशिक्षण लेने आ गयी मुजफफरपुर में इस प्रशिक्षण में ग्राम संगठन में का शैक्षणिक परिभ्रमण का एक दिवसीय कार्यक्रम था इसी कार्यक्रम को पुरा करने के लिए वैशाली  के समिप सरैया प्रखण्‍ड के रूपौली गांव में जयहिन्‍द ग्राम संगठन में रखा गया । ग्राम संगठन के शैक्षणिक परिभ्रमण के बाद सोचा की यहां से 10 कि मी की दुरी पर विश्‍व का प्रथम गणराज्‍य वैशाली है और भगवान म‍हावीर का जन्‍म स्‍थल भी है तथा बौध धर्म स्‍थल कोल्‍हुआ भी है तो मैने सोचा कयो ना इन स्‍थले का भ्रमण किया जाए जिससे की इनके बारे में मुझे जानकारी प्राप्‍त हो जाए तथा राज्‍स्‍थान से आयी महिलाओं को भी जानकारी प्राप्‍त इन जगहो का हो । तो चल दिया इन स्‍थलो का भ्रमण करने ग्राम संगठन के बैठक के बाद। यहां पर वैशाली में काफी अच्‍छी होटल भी है तथा एक बौध स्‍तूप भी है । यहां पर 30 रू देकर तलाब में बोटिग भी आनन्‍द लिया । तथा कोल्‍हूआ में जा कर अशोक स्‍तम्‍भ को भी देखा। यह स्‍थल मुजफफरपुर से 35 कि मी की दुरी पर है एवं पटना से 70 कि मी की दुरी पर है। इस स्‍थल के चारो और आम और लिची का काफी संख्‍या में पेड है यह स्‍थल पुरे देश में लिची और आम के लिए नामी है तथा इन स्‍थलों के चारो तरफ हरा भरा खेती होती है काफी रमणीक स्‍थल है इस स्‍थल पर विदेशी लोग भी भ्रमण करने के लिए आते रहते है। नये साल में मैने इस स्‍थल के यात्रा कर के शुरूआत किया यात्रा का। तो आइए जानते हे इन स्‍थलो के बारे में । वैशाली बिहार प्रान्त के वैशाली जिला में स्थित एक गाँव है। ऐतिहासिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध यह गाँव मुजफ्फरपुर से अलग होकर १२ अक्टुबर १९७२ को वैशाली के जिला बनने पर इसका मुख्यालय हाजीपुर बनाया गया। बज्जिका तथा हिन्दी यहाँ की मुख्य बोली/भाषा है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार वैशाली में ही विश्व का सबसे पहला गणतंत्र यानि "रिपब्लिक" कायम किया गया था। भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलंबियों के लिये वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ, यह उनकी कर्म भूमि भी थी। महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्वपूर्ण था। अतिमहत्वपूर्ण बौद्ध एवं जैन स्थल होने के अलावा यह जगह पौराणिक हिंदू तीर्थ एवंपाटलीपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है। मशहूर राजनर्तकी और नगरवधु आम्रपाली भी यही की थी आज वैशाली पर्यटकों के लिए भी बहुत ही लोकप्रिय स्थान है|वैशाली में आज दूसरे देशों के कई मंदिर भी बने हुए हैं|

वैशाली का नामाकरण महाभारत काल एक राजा ईक्ष्वाकु वंशीय राजा विशाल के नाम पर हुआ है। विष्णु पुराण में इस क्षेत्र पर राज करने वाले ३४ राजाओं का उल्लेख है जिसमें प्रथम नमनदेष्टि तथा अंतिम सुमति या प्रमाति था। इस राजवंश में २४ राजा हुए। राजा सुमति अयोध्या नरेश भगवान राम के पिता राजा दशरथके समकलीन थे। ईसा पूर्व सातवीं सदी के उत्तरी और मध्य भारत में विकसित हुए १६ महाजनपदों में वैशाली का स्थान अति महत्वपूर्ण था। नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जियों तथा लिच्‍छवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरूआत की गई थी। लगभग छठी शताब्दि ईसा पूर्व में यहाँ का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाने लगा और गणतंत्र की स्थापना हुई। विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्‍थान वैशाली ही है। आज वैश्विक स्‍तर पर जिस लोकशाही को अपनाया जा रहा है वह यहाँ के लिच्छवी शासकों की ही देन है। प्राचीन वैशाली नगर अति समृद्ध एवं सुरक्षित नगर था जो एक दूसरे से कुछ अन्तर पर बनी हुई तीन दीवालों से घिरा था। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि नगर की किलेबन्दी यथासंभव इन तीनों कोटि की दीवालों से की जाय ताकि शत्रु के लिये नगर के भीतर पहुँचना असंभव हो सके। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार पूरे नगर का घेरा १४ मील के लगभग था।
मौर्य और गुप्‍त राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्‍यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र था। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम संबोधन दिया था। इसकी याद में महान मौर्य महान सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दि ईसा पूर्व सिंह स्‍तंभ का निर्माण करवाया था। महात्‍मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग १०० वर्ष बाद वैशाली में दूसरे बौद्ध परिषद का आयोजन किया गया था। इस आयोजन की याद में दो बौद्ध स्‍तूप बनवाए गए। वैशाली के समीप ही एक विशाल बौद्ध मठ है, जिसमें महात्‍मा बुद्ध उपदेश दिया करते थे। भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद की पवित्र अस्थियां हाजीपुर (पुराना नाम- उच्चकला) के पास एक स्तूप में रखी गयी थी।

यह भी ambpali का जन्म स्थान है, वैशाली को चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म स्थल का गौरव भी प्राप्त है। जैन धर्मावलंबियों के लिए वैशाली काफी महत्‍वपूर्ण है। यहीं पर ५९९ ईसापूर्व में जैन धर्मतीर्थंकर भगवान महावीर का जन्‍म कुंडलपुर (कुंडग्राम) में हुआ था। वज्जिकुल में जन्मे भगवान महावीर यहाँ २२ वर्ष की उम्र तक रहे थे। इस तरह वैशाली हिंदू धर्म के साथ-साथ भारत के दो अन्य महत्‍वपूर्ण धर्मों का केंद्र था। बौद्ध तथा जैन धर्मों के अनुयायियों के अलावा ऐतिहासिक पर्यटन में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों के लिए भी वैशाली महत्‍वपूर्ण है। वैशाली की भूमि न केवल ऐतिहासिक रूप से समृद्ध है वरन कला और संस्‍कृति के दृष्टिकोण से भी काफी धनी है। वैशाली जिला के चेचर (श्वेतपुर) से प्राप्त मूर्तियाँ तथा सिक्के पुरातात्विक महत्व के हैं।
पूर्वी भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के पूर्व वैशाली मिथिला के कर्नाट वंश के शासकों के अधीन रहा लेकिन जल्द ही यहाँ बख्तियार खलजी़ का शासन हो गया। तुर्क-अफगान काल में बंगाल के एक शासक हाजी इलियास शाह ने १३४५ ई से १३५८ ई तक यहां शासन किया। बाबर ने भी अपने बंगाल अभियान के दौरान गंडक तट के पार अपनी सैन्य टुकड़ी को भेजा था। १५७२ ई॰ से १५७४ ई॰ के दौरान बंगाल विद्रोह को कुचलने के क्रम में अकबर की सेना ने दो बार हाजीपुर किले पर घेरा डाला था। १८ वीं सदी के दौरान अफगानों द्वारा तिरहुत कहलानेवाले इस प्रदेश पर कब्जा किया। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय वैशाली के शहीदों की अग्रणी भूमिका रही है। वसाबन सिंह्, बेचन शर्मा, अक्षयवट राय, सीताराम सिंह,baikunth shukla, yogendra shukla जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई के दौरान १९२०, १९२५ तथा १९३४ में महात्मा गाँधी का वैशाली में आगमन हुआ था। वैशाली की नगरवधू आचार्य चतुरसेन के द्वारा लिखी गयी एक रचना है जिसका फिल्मांतरण भी हुआ एवं जिसमे अजातशत्रु की भूमिका श्री सुनीलदत्त के द्वारा निभायी गयी है |
वैशाली की जलवायु मानसूनी प्रकार की है| वास्तव मे तत्कालीन वैशाली का विस्तार आजकल के उत्तर प्रदेश स्थित देवरिया एवं कुशीनगर जनपद से लेकर के बिहार के गाजीपुर तक था| इस प्रदेश मे पतझड़ वाले वृक्ष पाये जाते हैं| जिनमें आम, महुआ, कटहल, लीची, जामुन, शीशम, बरगद, शहतूत आदि की प्रधानता है| भौगोलिक रूप से यह एक मैदानी प्रदेश है जहां अनेक नदियां पायी जाती हैं इसका एक बड़ा हिस्सा तराई प्रदेश में गिना जाता है |
सम्राट अशोक ने वैशाली में हुए महात्‍मा बुद्ध के अंतिम उपदेश की याद में नगर के समीप सिंह स्‍तंभ की स्‍थापना की थी। पर्यटकों के बीच यह स्‍थान लोकप्रिय है। दर्शनीय मुख्य परिसर से लगभग ३ किलोमीटर दूर कोल्हुआ यानी बखरा गाँव में हुई खुदाई के बाद निकले अवशेषों को पुरातत्व विभाग ने चारदीवारी बनाकर सहेज रखा है। परिसर में प्रवेश करते ही खुदाई में मिला इंटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अशोक स्तम्भ दिखायी दे जाता है। एकाश्म स्‍तंभ का निर्माण लाल बलुआ पत्‍थर से हुआ है। इस स्‍तंभ के ऊपर घंटी के आकार की बनावट है (लगभग १८.३ मीटर ऊंची) जो इसको और आकर्षक बनाता है। अशोक स्तंभ को स्थानीय लोग इसे भीमसेन की लाठी कहकर पुकारते हैं। यहीं पर एक छोटा सा कुंड है, जिसको रामकुंड के नाम से जाना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इस कुण्ड की पहचान मर्कक-हद के रूप में की है। कुण्ड के एक ओर बुद्ध का मुख्य स्तूप है और दूसरी ओर कुटागारशाला है। संभवत: कभी यह भिक्षुणियों का प्रवास स्थल रहा है।

दूसरे बौद्ध परिषद की याद में यहाँ पर दो बौद्ध स्‍तूपों का निर्माण किया गया था। इन स्‍तूपों का पता १९५८ की खुदाई के बाद चला। भगवान बुद्ध के राख पाए जाने से इस स्‍थान का महत्‍व काफी बढ़ गया है। यह स्‍थान बौद्ध अनुयायियों के लिए काफी महत्‍वपूर्ण है। बुद्ध के पार्थिव अवशेष पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है यह। बौद्ध मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध के महा परिनिर्वाण के पश्चात कुशीनगर के मल्ल शासकों प्रमुखत: राजा श्री सस्तिपाल मल्ल जो कि भगवान बुद्व के रिश्तेदार भी थे के द्वारा उनके शरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया तथा अस्थि अवशेष को आठ भागों में बांटा गया, जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था। शेष सात भाग मगध नरेश अजातशत्रु कपिलवस्तु के शाक्य, अलकप्प के बुली, रामग्राम के कोलिय बेटद्वीप के एक ब्राह्मण तथा पावा एवं कुशीनगर के मल्लों को प्राप्त हुए थे। मूलत: यह पांचवी शती ई. पूर्व में निर्मित ८.०७ मीटर व्यास वाला मिट्टी का एक छोटा स्तूप था। मौर्यशुंग व कुषाण कालों में पकी इंटो से आच्छादित करके चार चरणों में इसका परिवर्तन किया गया जिससे स्तूप का व्यास बढ़कर लगभग १२ मीटर हो गया।
प्राचीन वैशाली गणराज्य द्वारा ढाई हजार वर्ष पूर्व बनवाया गया पवित्र सरोवर है। ऐसा माना जाता है कि इस गणराज्‍य में जब कोई नया शासक निर्वाचित होता था तो उनको यहीं पर अभिषेक करवाया जाता था। इसी के पवित्र जल से अभिशिक्त हो लिच्छिवियों का अराजक गणतान्त्रिक संथागार में बैठता था। राहुल सांकृत्यायन ने अपने उपन्यास "सिंह सेनापति" में इसका उल्लेख किया है।

विश्व शांति स्तूप

अभिषेक पुष्करणी के नजदीक ही जापान के निप्पोनजी बौद्ध समुदाय द्वारा बनवाया गया विश्‍व शांतिस्‍तूप स्थित है। गोल घुमावदार गुम्बद, अलंकृत सीढियां और उनके दोनों ओर स्वर्ण रंग के बड़े सिंह जैसे पहरेदार शांति स्तूप की रखवाली कर रहे प्रतीत होते हैं। सीढियों के सामने ही ध्यानमग्न बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमा दिखायी देती है। शांति स्तूप के चारों ओर बुद्ध की भिन्न-भिन्न मुद्राओं की अत्यन्त सुन्दर मूर्तियां ओजस्विता की चमक से भरी दिखाई देती हैं।

बावन पोखर मंदिर

बावन पोकर के उत्तरी छोर पर बना पालकालीन मंदिर में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ स्थापित है।

राजा विशाल का गढ़

यह वास्‍तव में एक छोटा टीला है, जिसकी परिधि एक किलोमीटर है। इसके चारों तरफ दो मीटर ऊंची दीवाल है जिसके चारों तरफ ४३ मीटर चौड़ी खाई है। समझा जाता है कि यह प्राचीनतम संसद है। इस संसद में ७,७७७ संघीय सदस्‍य इकट्ठा होकर समस्‍याओं को सुनते थे और उसपर बहस भी किया करते थे। यह भवन आज भी पर्यटकों को भारत के लोकतांत्रिक प्रथा की याद दिलाता है।

कुण्‍डलपुर 

यह जगह भगवान महावीर का जन्‍मस्‍थान होने के कारण काफी लोकप्रिय है। यह स्‍थान जैन धर्मावलंबियों के लिए काफी पवित्र माना जाता है। वैशाली से इसकी दूरी ४ किलोमीटर है।
इसके अलावा वैशाली महोत्‍सव, वैशाली संग्रहालय तथा हाजीपुर के पास की दर्शनीय स्थल एवं सोनपुर मेला आदि भी देखने लायक है।
पटनाहाजीपुर अथवा मुजफ्फरपुर से यहां आने के लिए सड़क मार्ग सबसे उपयुक्‍त है। वाहनों की उपलब्धता सीमित है इसलिए पर्यटक हाजीपुर या मुजफ्फरपुर से निजी वाहन भाड़े पर लेकर ज्यादा पसंद करते हैं। वैशाली से पटना समेत उत्‍तरी बिहार के सभी प्रमुख शहरों के लिए बसें जाती है।

रेल मार्ग
वैशाली का नजदीकी रेलवे स्‍टेशन हाजीपुर है जो पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय भी है। यह स्‍टेशन वैशाली से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है। दिल्‍लीमुंबईचेन्‍नईकोलकातागुवाहाठी तथा अमृतसर के अतिरिक्त भारत के महत्वपूर्ण शहरों के लिए यहां से सीधी ट्रेनसेवा है।

वैशााली स्‍तुप के पास बोटिग करते हुए  मै और प्रिस कुमार 

वैशाली में बना विश्‍व शांति स्‍तुप

कोल्‍हूआ का बोध स्‍तूप एवं अशोक स्‍तम्‍भ 

मेरा नया बनाया हुआ धर जिसके लिए मैने 2014 में कोइ्र भी यात्रा नही किया 

जयहिन्‍द ग्राम संगठन जिसमे राजस्‍थान से आयी एकिटव वुमन का शेक्षणिक परिभ्रमण कराया था 

राजस्‍थान से आयी एकिटव वुमन 



कोल्‍हूआ बौध स्‍तूप जाने का मुख्‍य द्वार


कोल्‍हूआ बौध स्‍तूप के अन्‍दर का फोटु 

कोल्‍हूआ का स्‍तुप

स्‍तुप गेट के बाहर का चित्र

भगवान महावीर का जन्‍म स्‍थल कुण्‍उलग्राम 

भगवान महावीर का मन्दिर कहा जाता है की यहां पर ही महावीर का जनम हुआ था 



यहां पर खाने पिने का व्‍यवस्‍था है कुण्‍डलग्राम में 

कोल्‍हूआ में बौध स्‍तूप के साथ अशोक कालिन स्‍तम्‍भ 

पोखर जो बौध स्‍तुप के पास है 

कुण्‍डलग्राम में बना मुख्‍य मन्दिर के पास का होटल यहां पर रात्री विश्राम किया जा सकता है 


गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

बद्रीनाथ से केदारनाथ की यात्रा


दिनांक 9 अक्‍टुबर 2013 को सुबह 6 बजे उठ कर ब्रदीनाथ के नजदीक बने तप्‍त कुण्‍ड में स्‍नान कर के श्रीबद्रीनाथ जी के मन्दिर में दर्शन किया एंव 7 बजें बद्रीनाथ के बस स्‍टैण्‍ड में जा कर जोशीमठ तक के लिए सुमो गाडी पर जा कर बैठ गया। गाडी खुलने में कुछ समय लग रहा था तो मै बस स्‍टैण्‍ड के पास ही बने एक ढाबा में गर्मा गर्म 2 आलु के पराठे को खाया इतने में गाडी को खुलने का समय हो गया। जब गाडी गोविन्‍दधाट पहुची तो यहां पर लैण्‍ड स्‍लाइड हो गया था जिसे सीमा संडक संगठन के लोग राश्‍ते को साफ करने में लगे हुए थे आप को बतला दु की उतराखण्‍ड के पहाडी क्षेत्रों में कभी भी लैण्‍ड स्‍लाइड हो जाती है। 1 धंटे तक रूकने के बाद सडक मार्ग साफ हुआ । 10 बजें जोशीमठ पहुचा जैसे ही जोशीमठ में पहुचा तो यहां से चमोली के लिए गाडी लगी हूयी थी मैने फटा फट चमोली जाने वाली गाडी पर बैठा और यह गाडी तुरन्‍त चमोली के लिए खुल गयी। जोशीमठ से चमोली पहुचने में 4 धंटे लग गए । चमोली 2 बजें पहुचा यहॉ पहुच कर चाय पानी लिया । चमोली उतराखण्‍ड का जिला जिसका मुख्‍यालय गोपेश्‍वर में है। गोपेश्‍वर चमोली से 13 कि मी की दुरी पर है । चमोली अलकनन्‍दा नदी के किनारे पर बसा हुआ एक सुन्‍दर स्‍थान है। चमोली से एक राश्‍ता चोपता  ऊखीमठ होते हुए केदारनाथ जाती है वही दुसरा राश्‍ता रूद्रप्रयाग  अगस्‍तममुनी गुप्‍तकाशी होते हुए केदारनाथ जाती है। अब मुझे यहां से जाना था केदारनाथ । वैसे तो मै अपनी योजना बना कर चला था की इस यात्रा में मै बद्रीनाथ हेमकुण्‍ड और औली जाउगा परन्‍तु 8 तारीख को मेरे मन में विचार आया की क्‍यो ना केदारनाथ जाउ मन हेमकुण्‍ड जाने को नही कर रहा था तो मैन सोने के पहले निर्णय लिया की 9 तारिख को केदारनाथ ही जाउगा। चमोली से रूद्रप्रयाग 70 कि मी है । रूद्रपयाग से गुप्‍तकाशी तक शाम 5 बजे तक गाडियां मिल जाती है पता चला की रूद्रपयाग से गुप्‍तकाशी के राश्‍ते में लैण्‍डस्‍लाइड हो जाने के कारण गाडी गुप्‍तकाशी नही जा पा रही है तो मैने चमोली से गोपेश्‍पर के राश्‍ते गुपतकाशी को जाने का निर्णय लिया और चल दिया चमोली से गोपेश्‍वर की और गोपेश्‍वर में मै 4 बजें पहुचां यहा पहुचने के बाद पता चला की गुपतकाशी के लिए पुरे दिन में एक ही गाडी जाती है वह 12 बजे दिन में जिसका नाम भुखहडताल है अब तो  अगली गाडी अगले दिन 12 बजें मिलेंगी तो मैन एक गाडी वाले से बात किया गाडीवाले ने गोपेश्‍वर से गुप्‍तकाशी तक जाने के लिए 3500 माग रहा था अब तो मुश्‍किल में मै पड गया मगर करता भी तो क्‍या करता 3000 रू में बात पक्‍की हुयी और चल पडा चमोली से गुप्‍तकाशी की और । चमोली से गुप्‍तकाशी 78 कि मी की दुरी पर है । यह राश्‍ता बेहद ही खतरनाक एव सुनसान है इस राश्‍ते से कुछ ही गाडीयां गुजरती है । राश्‍ते में चोपता मिला जहां पर मै 2012 में भी जा चुका था चोपता से ही पैदल तुगनाथ के लिए जाया जाता है यहां पर भगवान शिव का भव्‍य मन्दिर बना हुआ है यहां दिन में हिमालय की उच्‍च चोटियां में से गंगोत्री यमुनोत्री केदारनाथ की चोटी चौखम्‍भा निलंकंठ स्‍वगोरोहणी नन्‍दा देवी साफ साफ दिखाई देती है। चोपता में चाय पानी के बाद गुपतकाशी के लिए निकल पडा । यह राश्‍ता बेहद ही आनन्‍ददाय है राश्‍ते में केदारनाथ अभ्‍यारण पडता है कई प्रकार के ऊचे ऊचे पेड मिलते है। जिनमें देवदार चिर इत्‍यादी है। इस तरह शाम 7 बजें गुप्‍तकाशी पहुच कर 200 रू में एक कमरा बुक करवा । कमरा बुक कराने के बाद जानकारी लेने चल दिया की केदारनाथ जाने के लिए कैसा राश्‍ता है इसकी जानकारी लेने के लिए अपने कमरे के नजदीक में ही एक ढाबा में गया वहां पर खाना खाया और पता लगा की केदारनाथ जाने के लिए सबसे पहले गुप्‍तकाशी में गढवाल मण्‍डल विकास गिगम के कार्यालय से मेंडिकल फिटनेस प्रमाण पत्र एंव केदारनाथ यात्रा के लिए अनुमति प्रमाण पत्र बनाना पडेगा तब जा कर यात्रा प्रारम्‍भ किया जा सकेंगा। यात्रा के लिए सोनप्रयाग से पैदल यात्रा 27 कि मी तक का करना होगा राश्‍ता बेहद ही खतरनाक और चढाई वाला है।  9 अक्‍टुबर को गुप्‍तकाशी में भिड बिलकुल भी नही थी मै जिस होटल में ठहरा था उस होटल में 20 कमरे थे जिस में मै मात्र मेरे द्वारा ही 1 कमरा किराये पर लगा हुआ था । मैन 10 अक्‍टुबर को सुबह 7 बजें उठा और झटपट स्‍नान कर के तैयार हो गया । कमरे से बाहर जा कर सबसे पहले चाय और बिस्‍कुट का नाश्‍ता किया इसके बाद गढवाल मण्‍डल विकास निगम के कार्यालय में गया वहां पर जाने के बाद पता लगा की गढवाल मण्‍डल विकास निगम के कर्मचारी 10 बजें आएगे तब ही जा कर मेरा मेडिकल प्रमाण पत्र एंव केदारनाथ यात्रा करने के लिए प्रमाण पत्र बनेगा ।  तो मैने गुप्‍तकाशी में ही लोगों से बात चित करते हुए 10 बजा दिया इसके बाद गढवाल मण्‍डल विकास निगम के कार्यालय में गया वहां पर मात्र मै और दो और केदारनाथ यात्रा के लिए लोग पहुचे हुए था जिनमें एक आनध्र प्रदेश के जय सिता राम बाबा एंव एक राजस्‍थानी बाबा पहुचे हुए थे 11 बजें हम तिनों का मेडिकल जांच हुआ इस जांच के आधार पर केदारनाथ यात्रा के लिए प्रमाण पत्र बन गया । अब हमतिनों गुप्‍तकाशी से सोनप्रयाग के लिए गाडी पकड लिया और पहुच गए सोनप्रयोग । 16 जुन के त्रासदी के बाद अब गाडी सोनप्रयाग तक ही पहुच पाती है पहले गौरीकुण्‍ड तक गाडीयां जाया करती थी त्रासदी में गौरीकुण्‍ड से सोनप्रयाग तक के पुरा सडक पानी में बह गया है। सोनप्रयाग में 1 बजे पहुचा यहां  पर भयानक त्रासदी को देखकर मन विचलित हो गया मै जब 2012 में केदारनाथ आया था तो इस स्‍थान पर सैकडो लॉजे और दुकाने थी अब यहां पर 4 से 5 दुकाने और लॉजे बची हुयी थी यहां पर हमारा प्रमाण पत्र का जांच किया गया और आगे की यात्रा का अनुमति प्रदान हुआ। यहां से सिधे खडी चढाई है यहां से हम तिनों यानी जय सिताराम बाबा राजस्‍थानी बाबा और मै धुमनतु बाबा चल दिए पैदल गौरी कुण्‍ड के तरुफ शाम 6 बजें गौरीकुण्‍ड पहुचा । सोनप्रयाग से गौरीकुण्‍ड का राश्‍त पैदल 6 कि मी है बेहद ही खतरनाक एंव पथरीली न जाने कब पहाड से पत्‍थर निचे गिर जाए। गौरी कुण्‍ड 16 जुन के त्रासदी में पुरी तरह से तबाह हो चुका एक स्‍थान है यहां पर भी सैकडो लॉज एंव दुकाने थी अब सिर्फ यहां पर भी 10 से 15 के करीब लॉजे बची हुयी हे जो पुरी तरह से बन्‍द था यहां पर गढवाल मण्‍डल विकास निगम का एक होटल है जहां पर हम तिनों बाबाओ ने रात्री विश्राम किया और खाना भी खाया । अगले दिन 11 अक्‍टुबर को सुबह 6 बजें उठ कर स्‍नान ध्‍यान किया और चाय बिस्‍कुट खाया और हम तिनों निकल पडे केदारनाथ के लिए यहां सं केदारनाथ की दुरी 18 कि मी की है पहले यहां से दुरी 14  की थी । गौरीकुण्‍ड से केदारनाथ तक के जाने के राश्‍ता बेहद ही खतरनाक हो गया है। मेरा सोच था की आज ही के दिन केदारनाथ मन्दिर में जा कर शाम तक गौरी कुण्‍ड लौट आउगा क्‍योंकि 12 तारीख को हरिद्वार से रात्री 12 बजे मेंरा पटना को लौटने का रिर्जवेशन था  इस लिए मेरा पाव तेज गती से चल रहा था। परन्‍तु ईश्‍वर को कुछ ओर ही मंजुर था पैदल मार्ग अच्‍छा नही होने के कारण और ऊची चढाइ के कारण मै केदारनाथ में शाम 5 बजें पहुचां मै काफी थक चुका था वहां का नजरा बेहद ही दर्दनाक एंव विचित्र था क्‍योंकि मै केदारनाथ में 2012 के अक्‍टुबर माह में यात्रा कर चुका था इस लिए मै पहले का केदारनाथ धाटी एंव 2013 का केदारनाथ धाटी का तुलना मन ही मन कर रहा था । सरकारी प्रयास से तो केदारनाथ मन्दिर में 5 अक्‍टुबर से ही पुजा पाठ शुरू कर दिया गया लेकिन अभी भी मलबा और नरकंकाल बिखरे पडे हुए थे जिसकी स्‍थिति भयावह थी । सरकारी आंकडे तो कहते है की यहां पर हजारो की संख्‍या में लोग मरे है परन्‍तु यहां के स्‍थानीय निवासीयों के अनुशार यहां पर केदारधाटी में लाखों लोग मरे ओर हजारो लोगों का जीविका का साधन बर्बाद हो गया । यहां पर बने 125 लांज एंव होटल सैकडों दुकाने तबाही हो चुके थे सारा लांज एंव होटल एवं दुकाने मलबे में बदले चुके थे ओर इन मलबों में अभी भी सैकडो लाशें दबी हुयी थी जिसको दुर्गध आ रहा था । यदी कुद बचा हुआ था तो वह सिर्फ केदारनाथ जी का भव्‍य मन्दिर । इस मन्दिर के बचने में एक बडी शिला का योगदान है । यहां के स्‍थानीय निवासीयों का कहना है की यहां पाप बहुत बढ गया था यह स्‍थल तपभूमि के नाम से जाना जाता है यहां पर लोग तपस्‍या करने के लिए आते थे परन्‍तु आवागवन के साधन एंव रहने खाने पिने के साधन उपलब्‍ध होने के कारण लोग यहां पर ज्‍यादा आने तो लगे और रोजगार का भी साधन उपलब्‍ध होने लगे लकिन अब यहां पर लोग भक्ति भाव से कम तपस्‍या के ख्‍याल से कम और मस्‍ती करने हनीमुन मनाने एंव पिकनिक मनाने के लिए जयादा  आने लगे । यहां के होटलो में मांस और शराब बिकने भी लगे थे जिस कारण भोले नाथ ने अपनी तिसरी आंख कर कर गलत तरिक से किए गए  आचारण को एक बार में तबाह कर दिया ऐसा इस लिए हुआ की यहां पाप बढ गया था। वही वैज्ञानिक सोच वाले लोगों का कहना है की अक्‍सर यहां बारिश इतनी हुआ करती थी मगर कभी इतना तबाही नही हुआ । इस तबाही के कारण में उन्‍होने बतलाया की 16 जुन को बारिश तो बहुत जयादा हुयी ही साथ ही साथ यह बारिश केदारनाथ से 3 कि मी आगे बने केदारताल एंव गांधीसरोवर में इतनी बारीश हयी की यह तबला पुरी तरह से भर गया और सुमेरू पर्वत पर बना ग्‍लेशिर टुटने लगा जिससे पानी की मात्रा बढ गयी । गांधी सरोवर एंव केदारताल का मुहाना टुट गया जिससे कारण अचानक पानी का मात्र बढ गया और पानी के राश्‍ते में जो भी आया उसे बहा कर पानी चल दिया। मन्‍दाकनी नदी का उदगमन स्‍थल भी केदारनाथ के पास से ही है।    मन्दिर में शाम  6 बजें आरती शुरू किया गया वहां पर मात्र पुजारी जी के अलावा मात्र 3 ही व्‍यक्ति उपस्‍थित हुए ।  आज यह नदी भयावह दिख रही है। यह सब जानकारी होने के बाद केदारनाथ से 2 कि मी दुरी पर बना एन डी आर एफ के द्वारा कैम्‍प में रात्री विश्राम के लिए रूका यहां पर मुफत में चाय और खाना एंव ठहरने के लिए टेन्‍ट में लगा एक बेड मिल गया। रात्री में जब मै सो रहा था तब जोरदार बारिश शुरू हो गयी जिसके कारण मै थोडा डर गया मुझे लगने लगा की कही 16 जुन के हादसे वाला धटना फिर ना शुरू हो जाए मै फिर सोचने लगा की यदी मरना ही होगा तो मरूगा ही मौत को कौन रोक सकता हे ।हमारे यहां एक कहावत है यदी किश्‍यमत खराब होगी तो आप यदी हाथी पर बैठ कर भी सवारी करेंगें तो कुत्‍ता और को उछल कर काट ही लेगा। तो मैने भी ऐसा ही सोचा की जो होगा देखा जाएगा। रात बित गयी जब मै सुबह 6 बजें उठ कर टेन्‍ट से बाहर निकला तो नजरा ही कुछ और था सारे ऊची चोटीयों पर बर्फ जमें हुए दिखाई दे रहे थे बेहद ही खुबसुरत नजरा था पहाडो एंव केदारना‍थ धाटी का देख कर मन मुग्‍ध हो गया। मैने फटा फट अपना बैग पैक किया और जुते पहने एन डी आर एफ के लोगों के पास गया और चाय बिसकूट लिया और निकल पडा गौर कुण्‍ड की ओर । उस रात सिर्फ यात्री में मै ही टेन्‍ट में ठहरा था बाकी 5 से 7 लोग एन डी आर एफ वाले थे । 12 तारीख को मै सुबह 6 बजें केदारनाथ से 2 कि मी पहले बना लेमचुंग स्‍थल से निकल पडा क्‍यों की मै सोच रहा था की आज किसी भी हालत में मुझे 12 बजें तक हरिद्वार पहुचना है इस कारण मै थोडा राश्‍ते में रिस्‍क भी लेते हुए चल रहा था बनाये हुए राश्‍ते को छोड कर टुटी फुटी राश्‍ते को अपना रहा था जिससे दुरी कम हो और मै अपने नियत समय पर हरिद्वार पहुच पाऊ मगर किश्‍यम को कुछ और ही मंजुर था 27 कि मी चलने के बाद मै सोनप्रयाग में शाम 4 बजें पहुचा यहां पर किसी भी प्रकार का आवागमन की सुविधा मुझे गुप्‍तकाशी या रूद्रप्रयाग तक नही मिला । अनतम में यहां से 5 व्‍यक्ति ने मिल कर 1500 रू में एक एम्‍बेसडर कार किराये पर लिया वह भी गुप्‍तकाशी तक । सोनप्रयाग से गुप्‍तकाशी की दुरी मात्र 30 कि मी है । इस तरह शाम 6 बजे गुपतकाशी पहुचा यहां पहुच कर पता लगाया की क्‍या यहां से अभी रूद्रप्रयाग या हरिद्वार तक की गाडी अभी मिलेगी लेकिन पता चल गया यहां से अब अगल दिन ही गाडी मिलेगी यदी आप को हरिद्वार जाना हे तो यहां से रिर्जव गाडी करना होगा जिसका किमत 7000 रू के करीब होगा मै सोचने लगा की क्‍या गाउी रिर्जव करू या ना कर तब ही मेरे मन में ख्‍याल आया की गुपतकाशी से हरिद्वार का किराया सामान्‍यत; 300 रू है यदी सात हजार रूपये देकर ही जाना हे तो भारतीय रेल को दुगा और ए सी में सवारी करूगा । मैने अपना प्‍लान बदला और अफसोस करते हुए एक कमरा 200 रू में बुक कराया । आज के दिन मेंरा कुंभ एकसप्रेस में रिर्जेवेश्‍न था जो 450 रू का वह रिर्जवेशन तो गया ही गया साथ में मेरा 450 रू भी गया। जब रात में खाना खा रहा था तो टेलिविजन से पता चला की बंगाल की खाडी में एक बडा तुफान उठा जिसे पाइलिन नाम दिया गया है इससे ओडिसा एंव आन्‍ध्र प्रदेश में बहुत बडी
जान माल की क्षति होने की सम्‍भावना है इस पाइलिन तुफान से बिहार बंगाल झारखण्‍ड उतरप्रदेश मध्‍यप्रदेश छतिसगढ में में काफी नुकसान होने की समभावना है। इस समाचार को जान कर मन में काफी दुख हुआ की हमारे देश पर क्‍या हो गया है। एक तरफ हम भारतीय आतंकवाद नक्‍सलवाद और चीन एंव पाकिस्‍तान से परेशान है वही मौसम से भी हमारा देश परेशान अभी हाल ही में केदारनाथ में तबाही हुआ और अब पाईलिन से हमारे देश के लोगो का परेशानी बढेने वाली है।

यह सोचते सोचते मै सो गया अगले दिन 13 तारीख को 7 बजें उठा और फटा फट तैयार हो गया गुप्‍तकाशी में चाय की दुकान में जा कर चाय पिया और निकलपडा रूद्रपयाग की ओर। गुप्‍तकाशी से रूद्रपयाग का राश्‍त बिल्‍कुल खराब हो गयी है यह राश्‍त भी बाढ के कारण तबाह हो गया है इस राश्‍त से चलते हुए 10 बजें गुप्‍तकाशी को पहुचा । मेरा जुता पैदल चलने के कारण फट चुका था तो मैने सबसे पहल अपने जुते को सही करवाया और सोचने लगा की अब तो मेरा रिर्जवेशन भी नही है और पटना या गया तक जाना भी करीब रेलगाडी का 20 धंटे का सफर है । तब ही मेरे मन में विचार आया की क्‍यो ना रूद्रप्रयाग से पौडी होते हुए कोटद्वार तक जाउ कोटद्वार से निजामाबाद तक जाऊ । कोटद्वार में छोटा सा रेलवे स्‍टेशन है यहां से प्रत्‍येक आधे धंटे में निजामाबाद के लिए रेलगाडी मिलती है यहां से निजामाबाद की दुरी 25 कि मी है। तो मैने अब ठान लिया की अब मै देवप्रयाग के राश्‍ते से ना होकर पौडी के राश्‍ते से ही जाउगा । लोगो से सुना भी था की पौडी काफी ऊचाई पर बसा एक उतराखण्‍ड का जिला है यह करीबन 1900 मिटर की ऊचाइ्र पर बसा हुआ है यहां से उतराखण्‍ड की सबसे ऊची चोटीयों में गंगोत्री यमुनोत्री सुमेरू निलकंठ चौखम्‍भ नन्‍दादेवी साफ साफ दिखाइ् देती है इस तरह का दूश्‍य उतराखण्‍ड के दो स्‍थानो से ही देखा जा सकता है वह एक तो चोपता के पास तुगनाथ है यहां से काफी बेहतर से देखा जा सकता है और दुसरी पौडी हे। तो मैने रूद्रप्रयाग से पौडी जिले के श्रीनगर तक के लिए गाडी पकड लिया और तकरीबन 12 बजें पहुच गया श्रीनगर स्‍थल पर यहां पर एक बेहद ही सुन्‍दर बाजार है यही पर 1000 मेंगावाट का पन बिजली परियोजना पर कार्य भी चल रहा है और एक बेहद ही खुबसुरत महाविधालय भी है। यहां पर का स्‍थानीय मिठाई खाया और खाना भी खाया । खाना खा पीकर गाडी पकड लिया पौडी के लिए श्रीनगर से पौडी के लिए सिधी चढाई है करीबन 1 बजें पौडी पहुचा यहां से बेहद ही खुबसुरत नजरा दिखता  ऊची ऊची चोटीयों का । यहां से गाडी पकडी और थके होने के कारण मै गाडी में ही सो गया और तकरीबन 5 बजें कोटद्वार पहुच गया । कोटद्वार में नजिमाबाद के लिए पैसेजर गाडी लगी हुयी तो मैने जल्‍दी जल्‍दी टिक्‍ट कटवाया और गाडी में बैठ गया थोडी देर में गाउी नजिमाबाद पहुची वहां पता चला की बनारस के लिए गाउी रात्री 10 बजें है उसके पहले कोई भी गाडी नही हे तो मैने स्‍टेशन के नजदीक ही एक होटल मे रोटी चावल खाया और गाडी का इनतजार करने लगा तब ही स्‍टेशन के पास भिड जमा होने लगी तो मैने सोचा की ऐसा कयो है जो इतनी सारी भिड इक्‍ठठा हो गयी है तो पता चला की 16 तारीख को ईद है इसके लिए नजिमाबाद से एक व्‍यक्ति 70 किलो ग्राम  बकरा  लिए हुए है जिसकी किमत 80000 रू है। तो मैने भी देखने चला गया वाकई क्‍या मस्‍त बकरा था । मगर बेचारे को 16तारिख को कटने वाला था मैने उसे देखकर सोचने लगा की क्‍यो बकरे इसी लिए पालते है। रात्री 10 बजें अपने नियत समय पर गाडी प्‍लेटफांर्म 1 पर आयी मैने साधारण डिब्‍बे के लिए टिक्‍ट कटवाई थी जब साधारण डिब्‍बे में गया तो देखा की इसमें आदमी से जयादा बकरे सफर कर रहे है क्‍योंकी 16 तारीख को ईद जो था तो इस दिन कई जगहो से बकरे खरीद कर लोग अपने अपने बकरे ला रहे थें तो मैने रिर्जैवेशन बोगी में जा कर बैठ गया । गाडी चलने के बाद टी टी से सम्‍पर्क कर 250 रू दण्‍ड शुल्‍क देकर एक सिट आरक्षित करवायी और जा कर सो गया अगले दिन शाम 4 बजें बनारस में पहुचा यहां पर काफी मुसलाधार बारिश हो रही थी पाईलिन के चलते । बनारस में देहरादुन से चल कर गया के राश्‍ते हावडा तक जाने वली देहरादुन हावडा एक्‍सप्रेस बनारस के प्‍लेटफार्म न 6 पर लगी हुयी थी मैन टिकट जल्‍दी बाजी में नही लिया और जा कर बैठ गया इस रेलगाडी के सामान्‍य बोगी में तकरीब 9 बजें रात्री में गया स्‍टेशन पहुचा यहां पर गया पटना पैसेजर गाडी लगी हुयी थी यह गाडी 10 बजें रात्री में खुलने वाली थी तो मै इस गाउी में बैठ गया और जहांनाबाद तकरीबन 11 बजें रात्री में मै अपने धर पहुचा कर चादर तान कर थकान मिटाने के लिए सो गया क्‍यों की मुझे जोरदार निंद भी आ रही थी । इस तरह से मेंरा केदारनाथ एंव बद्रीनाथ की यात्रा सम्‍पन्‍न हुयी । 

मै धुमन्‍तु बाबा जय सिता राम बाबा एंव राजस्‍थानी बाबा 

केदारनाथ जाने का पैदल राश्‍त 


केदारनाथ धाटी में बहता हुआ एक मनमोहक झरना 

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इस स्‍थल पर गौरी कुण्‍ड हुआ करता था जो अब समाप्‍त हो गया यही से बाबा के भक्‍त लोग स्‍नान कर के मन्दिर को जाते थे 



यहां पर सैकडो लाशो को जलाया गया था 

मन्दिर का नजारा 16 जुन2013  के बाद का 




रात इसी कैम्‍प में गुजारना पडा था 

54 किलो मिटर पैदल चलने के बाद मेरा जुता का नजारा 

केदारधाटी का नजारा 

बिच्‍छु धास इसे छुने के बिच्‍छु के डक मारने जैसा जलन होता है यह केदारधाटी में अधिक पाया जाता है 

महाप्रलय के पहले का चित्र

सोनप्रयाग में संगम 

चोपता में धास का मैदान उतराखण्‍ड में धास के मैदान को बुग्‍याल बोला जाता है 

चोपता से गुप्‍तकाशी का सुनसान राश्‍ता 

चोपता यही से 4 कि लो मिटर पैदल चल कर चन्‍द्रशिला चोटी एंव तुंगनाथ को जाया जाता था इसी स्‍थल से उतराखण्‍ड में स्थित सारी चोटी साफ नजर आती है 



सोनप्रयाग में तबाही का मंजर 





यह वायुयान 16 जुन के त्रासदी में तबाह हो गया इसे 4 व्‍यक्ति का मौत हो गया था 






केदारनाथ से 2 कि मी दुरी पर बना यात्रीयों के लिए कैम्‍प 


केदारनाथ मन्दिर के समिप त्रासदी का चित्र





मन्दिर के पिछे जो शिला है वह पहले यहां नही था 16 जुन के त्रासदी में यह शिला आकर मन्दिर के समिप रूक गया जिससे मन्दिर सुरक्षित हो गया इस शिला का नाम दिव्‍य शिला रखा गया है 







बुराश का पौधा इस में फुल खिलते है मई माह में यह उतराखण्‍ड का राजकीय फुल है 

म‍न्‍दाकनी नदी पर बना आपातकालिन पुल इसे पार कर के जाना पडता है केदारनाथ मन्दिर के समिप 

यहां पर रामबाडा नामक स्‍थल था इस स्‍थल पर 77 दुकानं एंव लांज थे जो त्रासदी में बह गए अब यहां पर कुछ नही बचा है